श्रीमद भगवत गीता के पाठ से महान सिद्धि | Shrimad Bhagad Gita Path Se Mahan Siddhi

श्रीमद्भगवद गीता के पाठ की विधि हस्त लिखित ब्रह्माण्ड पुराण के आधार पर है।

श्रीमद भगवत गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह एक जीवन दर्शन है, जो हमें कर्म, भक्ति, ज्ञान और ध्यान का सच्चा मार्ग दिखाती है। इसके नियमित पाठ से ना केवल आध्यात्मिक शांति मिलती है, बल्कि जीवन में महान सिद्धियाँ भी प्राप्त होती हैं।


Shrimad Bhagad Gita Path Se Mahan Siddhi

सर्व कामत्व सिद्धि की विधि

* यदि आप श्री गीताजी को सिद्ध करना चाहें तो उसके लिये भी थी रामायणजी की भांति पहले रामायण की लिखी गई सामग्री लेकर एक दिन हवन करलें । निम्न श्लोक पढ़कर १०८ पाहुति थी व सामग्री की अग्नि में एक दिन डाल देवें ।

श्लोक
* कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः,
पृच्छामि त्वा धर्मसम्मूढचेताः,
यच्छे यः स्यान्निश्चितं ब्रहि तन्मे,
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् || अध्याय २/७

स्वाहा बोल कर १०८ आहुति दे दें गिनती के लिये जौ या चावल के १०८ दाने रख लेवें। हवन टाइम रात के दस बजे बाद हवन की सभी विधि रामायण के अनुष्ठान से मिलती है मुख पूर्व दिशा में रखें भगवान श्रीकृष्ण को साक्षी बनावें।

* पुनः श्री गीताजी का पाठ प्रारम्भ करो पाठ किसी भी समय किया जा सकता है। प्रत्येक श्लोक के बाद यह सम्पुट का श्लोक बोले
* "कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः.........." ..* प्रथम अध्याय से पाठ प्रारम्भ कर १८ अध्याय तक करें।
* पाठ १ या २ अध्याय का या सम्पूर्ण गीताजी का जैसा निभा सकें।
* पाठ करने से पहले इस श्लोक की एक माला जप लिया करें।
* १०८ पाठ करने से सर्व कामत्व सिद्धि प्राप्त होती है।

द्वितीय विधि

निम्न श्लोक गीता के १८ वें अध्याय का ७८ वां है।
श्लोक
* यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः,
तत्र श्रीविजयो भूतिश्रु वा नीतिर्मतिर्मम || अ० १८/७८

* इस श्लोक से पहिले लिखी भांति १ दिन हवन करे १०८ आहुति यह मंत्र बोलकर देवे फिर इसका सम्पुट लगा कर आगे लिखी विधि के अनुसार पाठ करे । अवश्यमेव लाभ होता है । पूर्ण श्रद्धा और पूर्ण विश्वास सफलता की कुंजी है।

मोक्ष प्राप्ति के लिये

संस्कृत
* बन्ध मोक्षश्चत्वारिंशद्दिन पर्यन्तं प्रत्यहं प्रत्यहं,
संहार क्रमेण पाठ त्रयं कुर्यात् बन्ध मोक्षो भवति ||

* यतीनां संहार क्रमः श्रेष्ठः ||

भावार्थ - संहार क्रम से ४० दिन तक ३ पाठ नित्य करने से मोक्ष हो जाता है।
प्रत्येक श्लोक पर अध्याय १८ के ७८ वें श्लोक का सम्पुट लगावें, सन्यासियों के लिये संहार-क्रम श्रेष्ठ है।

पद्य-
* संसार बन्धन मोक्ष की जो कामना योगी करे,
तो नित्य हौ संहार क्रम से तीन पाठों को करे ||

* चालीस दिन तक पाठ कर जब चित्त हो गोपाल में,
तो फिर नहीं बह पड़ सके ससार सागर जाल में ||

संहार क्रम से-
पाठ करने की विधि यह है कि गीताजी के अध्यायों का उल्टा पाठ करे यानी पहले अठारहवां अध्याय पढ़े
फिर (१७) सत्तरहवां फिर (१६) फिर (१५) फिर (१४) पुनः (१३) पुनः (१२) पुनः (११) पुनः (१०) पुनः (६) फिर (८)
(७), (६), (५), (४), (३), (२) सबसे अन्त में (१) पहला अध्याय इस प्रकार से पाठ करना संहार क्रम है । प्रतिदिन ३ पाठ करे ४० दिन तक मोक्ष के लिये ||

लक्ष्मी प्राप्ति के लिये

संस्कृत -
* श्री कामः स्थिति क्रमेण पठेत धन प्राप्तिर्भवेत्,
गृहस्थानां स्थिति क्रम श्रेष्ठः ||

भावार्थ:-
* लक्ष्मी की कामना से, स्थिति-क्रम से, एक पाठ नित्य करने से लक्ष्मी प्राप्ति होती है । अध्याय १८ के ७८ वें
श्लोक का सम्पुट लगावें । गृहस्थियों के लिये स्थिति-क्रम श्रेष्ठ है।

पद्य-
* श्री कामना से पाठ करना यदि किसी को इष्ट हो,
स्थिति क्रम नियम धारण करे तो सकल दूर अनिष्ट हो,
सब सौख्य उसको नित मिलें धन-धान्य की अति वृद्धि हो,
नित पाठ करने से सदा कल्याण सुख समृद्धि हो ||

* स्थिति क्रम से पाठ करने की विधि यह है। पहले गीताजी को खोलकर पांचवे अध्याय का पाठ करे (५) फिर ६, ७, ८, ६. १०, ११, १२, १३, १४, १५, १६, १७, १८, पुनः अठारहवें के उपरान्त चौथे अध्याय का पाठ करें फिर ३ का, २ का, १ का इस रीति से पाठ करने को स्थिति-क्रम कहते हैं प्रतिदिन १ पाठ करने से लक्ष्मी प्राप्ति होती है।

विवाह व सन्तान-प्राप्ति की विधि

संस्कृत-
* विवाह कामः सृष्टि क्रमेण पठेत्,
ब्रह्मचारिणां सृष्टि क्रमः श्रेष्ठः ||

भावार्थ -
* विवाह की कामना वाला सृष्टि क्रम से पाठ करे।
* प्रत्येक श्लोक पर अध्याय १८ के ७८ वें श्लोक का सम्पुट लगावे।
* ब्रह्मचारियों के लिये सृष्टि क्रम श्रेष्ठ है ।

पद्य-
* ब्रह्मचारी धर्म निज पालन करे जो क्षेम से,
उपरान्त धर्म गृहस्थ जब स्वीकार करता प्रेम से,
तो प्राप्त करता वही नर श्री, रूप, नारी, लोक में,
फिर सृष्टि क्रम से पाठ कर होता कभी नहीं शोक में ||

सृष्टि-क्रम से पाठ करने की विधि-
* प्रथम श्री गीताजी को खोलकर प्रथम अध्याय से लेकर सीधा पाठ करे यानी पहला- १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२, १३, १४, १५, १६, १७, १८, इस प्रकार पाठ करने को सृष्टि-क्रम कहते हैं।

* प्रतिदिन १ पाठ करने से गृहस्थ में सर्व सुख रहते हैं। दूसरी, तीसरी, चौथी विधि का सम्पुट वाला निम्न श्लोक
है। गीता अध्याय १८ श्लोक ७८।

श्लोक -
* यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः,
तत्र श्रीविजयो भूतिध्रुवा नीतिमंतिर्मम ||

सभी बाधा निवारण के लिये

संस्कृत -
* सर्व बाधा निवृत्यर्थं दशमाध्यायमारभ्य संपुटितं पठेत् ||

अर्थः -
* सभी बाधाओं की निवृत्ति के लिये दशवें अध्याय से लेकर सम्पुट लगा कर पाठ करै प्रत्येक श्लोक पर यह सम्पुट
लगावे।

सम्पुट श्लोक -
* यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः,
तत्र श्रीविजयो भूतिध्रु वा नीतिर्मतिर्मम || १८-७८

विधिः -
* उपरोक्त सम्पुट हर एक श्लोक पर लगाता हुआ पहले गीताजी का दसवां (१०) अध्याय पढ़े फिर ११ वां
पुनः १२, १३, १४, १५, १६, १७, १८, फिर ६, ८, ७, ६, ५, ४, ३, २, १ इस प्रकार प्रति दिन एक पाठ करे १०० पाठ करने पर लाभ होता है।

अन्न पूर्णा सिद्धि के लिये

प्रतिदिन श्री गीताजी के पन्द्रहवें अध्याय का पाठ करने से कभी भी अन्न वस्त्र का अभाव नहीं रहता ।

★ इति श्री ब्रह्माण्ड पुराणे गीता पाठ विधि समाप्त ★

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